vikram sarabhai

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विक्रम साराभाई कौन थे, ISRO स्थापना कैसे हुई ?

30 दिसंबर, 1971 को उनकी मृत्यु उसी स्थान के नजदीक हुई थी जहां उन्होंने भारत के पहले रॉकेट का परीक्षण किया था. दिसंबर के आखिरी हफ्ते में वे थुंबा में एक रूसी रॉकेट का परीक्षण देखने पहुंचे थे और यहीं कोवलम बीच के एक रिसॉर्ट में रात के समय सोते हुए उनकी मृत्यु हो गई.

विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को हुआ था.  इनके पिता एक अमीर कपड़ा व्यापारी थे. साराभाई इसरो के भी अध्यक्ष रहे. इन्होंने परमाणु उपकरणों को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाने के पक्ष में अपने तर्क दिए.

डॉक्टर साराभाई ने गुजरात के एक कॉलेज से पढ़ाई की. आगे की पढ़ाई के लिए वो कैंब्रिज यूनिवर्सिटी चले गए थे. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इन्होंने बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में नोबेल विजेता डॉक्टर सी.वी रमन के साथ काम किया.

साराभाई कैम्ब्रिज फिलोसोफिकल सोसाइटी में थे और अमेरिकी जियो फिजिकल यूनियन के सदस्य थे.

अपनी पढ़ाई के बीच 1939 में भाभा भारत आए थे और इसी समय दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया. इसके बाद उन्होंने यूरोप जाने का विचार छोड़ दिया और बैंगलोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएस) से जुड़ गए.

साल 1942 में साराभाई का विवाह मृणालिनी साराभाई से हुआ था. इनकी पहली संतान कार्तिकेय का जन्म 1947 में हुआ.

साल 1962 में इन्हें इसरो का कार्यभार सौंपा गया. उनकी निजी संपत्ति को देखते हुए उन्होंने अपने काम के लिए मात्र एक रुपए की टोकन सैलरी में काम किया.

भाभा और साराभाई की मुलाकात

कैंब्रिज से लौटे साराभाई की मुलाकात होमी जहांगीर भाभा से हुई. दोनों ने कॉस्मिक किरणों के क्षेत्र में अनुसंधान किया था लेकिन भाभा जहां अणु विज्ञान में दिलचस्पी रखते थे तो साराभाई के अध्ययन का क्षेत्र अंतरिक्ष विज्ञान था.

यह 1950 का दशक था. दुनिया के तमाम शीर्ष देशों में परमाणु अनुसंधान और अंतरिक्ष विज्ञान से संबंधित संस्थानों और परियोजनाओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा था. भारत के पास इन दोनों क्षेत्रों का नेतृत्व करने के लिए दो प्रतिभाशाली वैज्ञानिक मौजूद थे. भारत में आजादी के तुरंत बाद 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग बनाया गया और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भाभा को इसका पहला अध्यक्ष नियुक्त किया. वे नेहरू के वैज्ञानिक सलाहकार भी थे.

उस समय साराभाई की उम्र महज 28 साल थी लेकिन कुछ ही सालों में उन्होंने ‘भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल)‘ को विश्वस्तरीय संस्थान बना दिया था

वहीं दूसरी तरफ साराभाई ने 1947 में अहमदाबाद में ‘भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल)’ की स्थापना की थी. साराभाई के पिता उद्योगपति थे और भौतिक विज्ञान के अध्ययन-अनुसंधान के इस केंद्र के लिए उन्होंने अपने पिता से ही वित्तीय मदद मिली थी.

उस समय साराभाई की उम्र महज 28 साल थी लेकिन कुछ ही सालों में उन्होंने पीआरएल को विश्वस्तरीय संस्थान बना दिया. और बाद में भारत सरकार से उसे मदद भी मिलने लगी. पीआरएल मुख्यरूप से अंतरिक्ष विज्ञान के अनुसंधान से जुड़ी संस्था है लेकिन इसकी स्थापना और संचालन के अनुभव ने वैज्ञानिक साराभाई को एक कुशल प्रबंधक भी बना दिया था.

साराभाई ने बिजनेस भी किया

PRL के बाद उन्होंने पारिवारिक कारोबार में हाथ आजमाया और गुजरात के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में उद्योगों की स्थापना की. उन्होंने साराभाई कैमिकल्स, साराभाई ग्लास, सेमिबायोटिक्स लिमिटेड, साराभाई इंजीनियरिंग ग्रुप जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों की स्थापना ही नहीं की थी बल्कि इन्हें अपने-अपने क्षेत्र में अगुवा भी बना दिया.

यही नहीं देश के पहले प्रबंधन संस्थान – इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (अहमदाबाद) की स्थापना भी विक्रम साराभाई ने ही की थी. हालांकि इस सबके बावजूद उनका मन कॉस्मिक किरणों और अंतरिक्ष विज्ञान में ज्यादा लगा.

अंतरिक्ष की दुनिया में लौटे

जुलाई साल 1957 में रूस ने दुनिया का पहला उपग्रह – स्पूतनिक, पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया था. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस और अमेरिका सहित 50 से ज्यादा देशों ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक साल तक चलने वाली एक परियोजना के लिए गठबंधन किया था.

विक्रम साराभाई चाहते थे कि भारत भी इसका हिस्सा बने और उन्होंने इसके लिए सरकार को एक प्रस्ताव बनाकर भेज दिया. प्रधानमंत्री नेहरू निजी तौर पर भी साराभाई को जानते थे और होमी भाभा की वजह से उनकी प्रतिभा भी पहचानते थे. उनकी सरकार ने यह प्रस्ताव मान लिया. भारत की तरफ से इस प्रयोग को देखने-समझने की जिम्मेदारी साराभाई को ही दी गई थी.

इसरो कैसे बना?

स्पूतनिक की लॉन्चिंग के साथ अचानक दुनिया के तमाम देशों की दिलचस्पी अंतरिक्ष विज्ञान में हो गई थी. विक्रम साराभाई के लिए भी यह क्रांतिकारी घटना थी और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पंडित नेहरू को चिट्ठी लिख दी कि भारत को इस दिशा में काम करना चाहिए. उनकी सलाह मानते हुए सरकार ने 1962 में इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च (इनकॉस्पर) बना दी और नेहरू ने इसकी कमान साराभाई को सौंप दी. यही इनकॉस्पर बाद में इसरो बना था.

साराभाई अब जल्दी से जल्दी भारत में अतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत करना चाहते थे. उन्हें इसके लिए अपने मार्गदर्शक वैज्ञानिक डॉ भाभा का भरपूर सहयोग मिला. इन्हीं दोनों ने पहले रॉकेट परीक्षण के लिए केरल के थुंबा का चयन किया था और इनके निर्देशन में ही 1963 में यहां से पहला प्रायोगिक रॉकेट छोड़ा गया. यह अमेरिका में बना रॉकेट था और अब साराभाई चाहते थे कि यहां से भारत निर्मित रॉकेट छोड़ा जाए.

भारतीय वैज्ञानिकों को देसी रॉकेट बनाने में चार साल का समय लग गया. हालांकि इस बीच में एक ऐसी घटना भी हुई जिससे साराभाई सहित पूरे भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को भारी धक्का लगा था. दरअसल जनवरी, 1966 में डॉ होमी जहांगीर भाभा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की बैठक में भाग लेने विएना रवाना हुए थे और स्विटजरलैंड के ऊपर उनका हवाई जहाज क्रैश हो गया.

इस हादसे में भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ परमाणु वैज्ञानिक खो दिया था. होमी जहांगीर भाभा के निधन के बाद विक्रम साराभाई की कोशिशें रंग लाईं और आखिरकार नवंबर, 1967 में थुंबा से पहला भारत निर्मित रॉकेट – रोहिणी छोड़ा गया.

डॉ भाभा की मृत्यु के बाद साराभाई को भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग का भी अध्यक्ष बना दिया गया. इसके साथ ही 1969 में इनकॉस्पर को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन या इसरो बना दिया गया.

साराभाई इसके पहले अध्यक्ष थे. उन्हीं के नेतृत्व में इसरो की कई इकाइयों की स्थापना हुई है.

विक्रम साराभाई का निधन

30 दिसंबर, 1971 को उनकी मृत्यु उसी स्थान के नजदीक हुई थी जहां उन्होंने भारत के पहले रॉकेट का परीक्षण किया था. दिसंबर के आखिरी हफ्ते में वे थुंबा में एक रूसी रॉकेट का परीक्षण देखने पहुंचे थे और यहीं कोवलम बीच के एक रिसॉर्ट में रात के समय सोते हुए उनकी मृत्यु हो गई.

होमी भाभा की तरह साराभाई की मृत्यु पर भी संदेह जताया जाता है. इसरो से संबंधित एक पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायण अपनी आत्मकथा में इस बात का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि साराभाई की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी लेकिन फिर भी उनका पोस्टमार्टम नहीं कराया गया.