Kailasavadivoo Sivan

Kailasavadivoo Sivan

Kailasavadivoo Sivan कैसे बने चंद्रयान -२ के नायक?

के सिवन ने साल 1977 में मदुरै यूनिवर्सिटी से गणित में स्नातक किया. के सिवन अपने परिवार के पहले शख्स थे जिन्होंने स्नातक किया था. इस परीक्षा में जब उनके 100 फीसदी अंक आए तब उनके पिता ने उन्हें आगे की पढ़ाई की इजाज़त दी.

इसरो प्रमुख के सिवन का पूरा नाम Kailasavadivoo Sivan (कैलासवादिवु सिवन) है. उनका जन्म 14 अप्रैल साल 1957 में तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में हुआ. एक किसान परिवार में जन्में के सिवन का परिवार बेहद तंगी में गुजारा करता था. उनकी शुरुआती पढ़ाई मेला सराकलाविल्लई गांव के सरकारी स्कूल में तमिल माध्यम में हुई. उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा भी तमिल माध्यम से ही की. स्कूल में पढा़ई के साथ ही वो खेतों में अपने पिता की मदद करते थे. गरीबी की वजह से उनके छोटे भाई बहन उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर सके.

के सिवन ने साल 1977 में मदुरै यूनिवर्सिटी से गणित में स्नातक किया. के सिवन अपने परिवार के पहले शख्स थे जिन्होंने स्नातक किया था. इस परीक्षा में जब उनके 100 फीसदी अंक आए तब उनके पिता ने उन्हें आगे की पढ़ाई की इजाज़त दी.

इसके बाद के सिवन ने साल 1980 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से एयरोनॉटिक्स में इंजीनियरिंग की. इसके दो साल बाद बेंगलुरू के भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) से उन्होंने एयरोस्पेस में स्नातकोत्तर किया और इसी वर्ष इसरो से भी जुड़ गए. फिर 2007 में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में आईआईटी बॉम्बे से अपनी पीएचडी पूरी की.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में वीएसएससी, एलपीएससी के निदेशक, जीएसएलवी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर, अंतरिक्ष आयोग के सदस्य और इसरो परिषद के उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों से होते हुए सिवन 2018 में इसरो प्रमुख बने.

रॉकेटमैन

चंद्रयान-2 मिशन के अलावा भी सिवन की कई ऐसी उपलब्धियां हैं, जिनके लिए वो हमेशा जाने जाएंगे. साल 1982 में ही सिवन पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) प्रोजेक्ट का हिस्सा बनकर ISRO से जुड़ चुके थे. उन्होंने एंड टु ऐंड मिशन प्लानिंग, मिशन डिजाइन, मिशन इंटीग्रेशन ऐंड ऐनालिसिस में काफी योगदान दिया.

सिवन ने भारत के स्पेस प्रोग्राम में क्रायोजेनिक इंजनों को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई. इसके अलावा सिवन ये सुनिश्चित करने की रणनीति भी लेकर आए कि रॉकेट मौसम और हवा की अलग-अलग स्थिति में लॉन्च हो सकें. इन योगदानों की वजह से ही सिवन को रॉकेट मैन कहा जाने लगा. फरवरी 2017 में PSLV-C37 से 104 सैटेलाइट को एक ही फ्लाइट में सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था. इस मिशन में सिवन का अहम योगदान था. ISRO के चेयरमैन बनने से पहले सिवन त्रिवेंद्रम में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के डायरेक्टर थे.

हर नागरिक के जीवन में अंतरिक्ष विज्ञान

के सिवन के ही नेतृत्व में लिथियम बैटरी बनाई गई है जिसे इलेक्ट्रिक व्हीकल में इस्तेमाल किया जा सकेगा. के सिवन के मुताबिक इसरो का मुख्य उद्देश्य ‘आम जीवन में अंतरिक्ष विज्ञान का इस्तेमाल’ है. उनके मुताबिक इसरो रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने वाली तकनीक को उद्योग से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रहा है. इसरो ने अब तक 300 से 400 तकनीक इंडस्ट्री को ट्रांसफर किए हैं.

चिकित्सा उपकरणों के विकास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई काम किए हैं. बेहतर माइक्रोप्रोसेसर नियंत्रित कृत्रिम अंग और कृत्रिम हृदय पंप जिसे वाम वेंट्रिकल असिस्ट डिवाइज कहा जाता है उसे फील्ड ट्रायल के लिए तैयार किया गया है. सिवन उस टीम के प्रमुख रहे हैं जिसने सिक्स डी सिम्युलेशन सॉफ़्टवेयर ‘सितारा’ बनाई है जो इसरो के सभी प्रक्षेपण में एक अहम किरदार निभाता है.

उन्होंने एक ऐसी रणनीति का विकास किया है जिसने मौसम के पूर्वानुमान और हवा की गति की स्थिति को देखते हुए किसी भी मौसम में और साल के किसी भी दिन रॉकेट को लॉन्च करना संभव किया है.

अवॉर्ड

के सिवन को साल 2007 में ISRO मेरिट अवॉर्ड मिला, साल 2011 में रॉय स्पेस साइंस एंड/और डिजाइन अवॉर्ड मिला, साल 2013 में MIT एल्मुनी एसोसिएशन से डिस्टिंगुइश्ड एल्मुनस अवॉर्ड मिला और साल 2014 में सत्यभामा यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट ऑफ साइंस (ओनोरिस कोसा) मिला.