ISRO को बेहद खास बनाने वाले सतीश धवन कौन थे

देश के कुछ संस्थान ऐसे हैं जो हमें गर्व करने का हमेशा मौका देते रहते हैं. उनमें से एक है इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानी ISRO. इसरो को देश ही नहीं दुनिया का सबसे उन्नत स्पेस रिसर्च सेंटर बनाने में प्रोफेसर सतीश धवन का बेहद खास योगदान रहा है. सतीश धवन को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई का स्थान साल 1972 में दिया गया और उन्होंने ISRO का अध्यक्ष बनाया गया. 25 सितंबर साल 1920 में पैदा हुए सतीश धवन की जिंदगी से लेकर उपलब्धियों के बारे में आइए बात करते हैं-

साइंस, इजीनियरिंग से लेकर आर्ट्स तक की डिग्रियां

सतीश धवन का जन्म श्रीनगर में हुआ था. बचपन से ही पढ़ने में तेज सतीश धवन की डिग्रियां गिनते-गिनते शायद आपको चक्कर सा आ जाए:

  • पंजाब के लाहौर से (जो अब पाकिस्तान में है) से फिजिक्स और मैथमैटिक्स में ग्रेजुएशन
  • मैकेनेकिल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन
  • इंग्लिश लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएशन
  • 1947 में अमेरिका की मिन्नेसोटा यूनिवर्सिटी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स
  • कैलीफॉर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से एयरोस्पेस इंजीनयरिंग की डिग्री
  • मैथमेटिक्स और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में डबल पीएचडी

अब आप सोच सकते हैं कि आज के समय में क्या किसी भी शख्स की तुलना प्रोफेसर सतीश धवन से करना जायज है?

Satish Dhawan
Satish Dhawan

धवन की उपलब्धियां ही उन्हें महान बनाती है

सतीश धवन ने एयरोस्पेस साइंस के साथ ही दूसरे सेक्टर्स में देश को काफी कुछ दिया है. सुपरसोनिक फ्लाइट बनाने की प्रक्रिया में शॉक वेव्स स्टडी का खास योगदान होता है. इसे धवन ने ही अपने रिसर्च में बताया था. उनकी उपलब्धियों के कारण हीं उन्हें ‘फादर ऑफ एक्‍सपेरीमेंटल फ्लूइड डायनामिक्‍स’ कहा जाता है.

सुपरसोनिक विंड टनल का श्रेय धवन को

देश उस दौर में था जब उसे सुपरसोनिक यानी साउंड की स्पीड जैसी तेजी वाले विमानों की जरूरत थी. अब उसकी टेस्टिंग के लिए एक काल्पनिक माहौल जिसे सुपरसोनिक विंड टनल कहा जाता है उसकी जरूरत होती थी. इसका जिम्मा सतीष धवन को दिया गया और उन्होंने IISc बेंगलुरु में पहला ऐसा टनल बनाकर दिखा दिया.

ISRO ‘हीरो’ संस्था है, सतीश धवन का काफी योगदान

साल 1972 में उन्हें ISRO का अध्यक्ष, विक्रम साराभाई की जगह बनाया गया. इस दौरान उन्होंने INSAT, IRS और PSLV के रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट कम्यूनिकेशन डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी संभाली और देश को कई नायाब सैटेलाइट टेक्निक दिए.

टीचिंग उनका पसंदीदा प्रोफेशन

महज 42 साल की उम्र में वो देश के सबसे बड़े साइंस इंस्टीट्यूट में शुमार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस यानी IISc के डायरेक्टर बन गए थे. उन्होंने IISc में इससे पहले एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी संभाली थी. तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़ने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने IISc को ही अपनी सेवाएं देने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई थी.

 

साल 2002 में इस महान वैज्ञानिक और शिक्षक देहांत हो गया.

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