देश की सबसे मशहूर यूनिवर्सिटी JNU की बेमिसाल खासियत और विवादों के बारे में हर एक बात जानिए

देश की राजधानी दिल्ली का JNU (जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी) वामपंथ का गढ़ कहा जाता है. पूरे देश में दूसरी कोई यूनिवर्सिटी नहीं है जिसका केंद्रीय राजनीति में इतना दखल हो, जितना JNU का है.

JNU (फोटो: द वायर)

आपको कन्हैया प्रकरण तो याद ही होगा, आज वामपंथ के नाम पर कन्हैया को ही सबसे मुखर चेहरा माना जाने लगा है. इन सब विवादों से इतर जेएनयू की अपनी एक पहचान है, उसकी पढ़ाई, उसका इतिहास और सबसे खास वहां की संस्कृति ऐसी है अगर किसी छात्र ने जेएनयू एक बार देख लिया तो उसके दिल में शिद्दत होती है कि JNU में नहीं पढ़ा तो क्या पढ़ा.
आइए जानते हैं इस बेमिसाल यूनिवर्सिटी की खासियत, विवाद और कुछ और पहलुओं के बारे में:

70 के दशक में हुई थी JNU की शुरुआत

इस यूनिवर्सिटी की शुरुआत संसद के एक्ट से साल 1969-70 में हुई थी. ये देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय हैं जहां पिछड़े ज़िलों से आने वालों को इसके लिए एक्स्ट्रा नंबर दिए जाते हैं. इसी कारण से संभव हो सकता है कि देश का अमीर से अमीर घराना और गरीब से गरीब घर के बच्चे आपको जेएनयू में मिल जाएंगे.

जेएनयू एंट्रेस एग्जाम के दौरान इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि अधिकत्तर राज्यों के बच्चों को यहां पर जगह मिल सके. पढ़ाई में पिछड़े राज्यों पर फोकस होता है.

ग्रेजुएशन में सिर्फ और सिर्फ विदेशी भाषाएं

JNU में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स में तो तकरीबन हर सब्जेक्ट की पढ़ाई होती है, इसके लिए संस्थान में अलग-अलग सेंटर और स्कूल हैं. देश का ये पहला ऐसा विश्वविद्यालय हैं जहां सोशल साइंस के लिए कई तरह के रिसर्च की व्यवस्था है. वहीं इस यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन में सिर्फ स्पैनिश, कोरियन, चाइनीज और दूसरी भाषाएं पढ़ाई जाती है.

देश में दूसरा ‘JNU’ नहीं

जेएनयू में जब छात्रसंघ चुनाव होता है तो उसी से आप समझ सकते हैं कि यहां का बौद्धिक स्तर कितना ऊंचा है. अमेरिका के प्रेसिडेंट इलेक्शन की तरह यहां भी प्रेसिडेंशियल डिबेट होता है जहां विभिन्न विचारधारा वाले छात्र कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करते हैं. मार काट की संस्कृति आप किसी और यूनिवर्सिटी के चुनावों में देख सकते हैं यहां हिंसा के लिए कोई भी जगह नहीं.

हाथ से बनी पेंटिंग पूरे कैंपस की जान है

जेएनयू में आपको हाथ से बनी पेंटिंग तकरीबन हर 10 कदम पर दीवारों पर मिल जाएंगी, जिनपर कई सामजिक मुद्दे उकेरे गए होते हैं, पर्चे भी हाथ से बनाने का यहां चलन हैं. यहां तक कि चुनावों में भी ये प्रिंटिंग का कम ही इस्तेमाल करते हैं. जो उम्मीदवार ऐसा करता है उसे बुरा माना जाता है.

विरोध की पहली ‘आवाज’ जेएनयू से ही उठती है

बोलती दीवारें हैं खासियत (फोटो: Al Jazeera)

आज से नहीं बल्कि कॉलेज बनने के बाद से ही विरोध की पहली आवाज इस यूनिवर्सिटी से ही उठती है. प्रकाश करात, सीताराम येचुरी जो वामपंथ के बड़े चेहरे में शुमार हैं वो इसी कॉलेज की देन हैं. जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था तो सीताराम येचुरी के नेतृत्व में जेएनयू के छात्र इंदिरा के पास पहुंचे और उनकी गलतियां गिनाईं. साथ ही मांग रखी गई कि उन्हें जेएनयू के चांसलर के पद से इस्तीफा देना चाहिए और ऐसा ही हुआ.

ऐसे में ये कहना कि ये सिर्फ एक ही पार्टी या विचारधारा के विरोध वाली यूनिवर्सिटी है, सरासर गलत है.

पहली बार किसी भी कॉलेज में कंडोम वेंडिंग मशीन यहीं लगी

जेएनयू के बारे में दुष्प्रचारों का भी दौर चलता है लेकिन उसके पीछे का अर्थ बिना समझे बोलकर ही दुष्प्रचार फैलाया जाता है. बता दें कि इस जेएनयू देश की पहली यूनिवर्सिटी थी जहां कंडोम वेंडिंग मशीन लगाई गई थी, बाद में इसे हटा लिया गया.

कई विवाद भी जु़ड़े रहे

जेएनयू और विवादों का भी पुराना नाता रहा है, आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही विवादों के बारे में भी

  • साल 2010 में नक्सली हमले में दंतेवाड़ा में 75 जवानों की मौत हुई कहा जाता है कि तब JNU में कथित तौर पर विजय दिवस मनाया गया
  • आरोप ये भी लगे कि यहां हर साल JNU के एक स्टूडेंट पर 3 लाख सरकारी खर्च आता है, उस हिसाब से रिसर्चर्स और दूसरा योगदान देने वाले इस यूनिवर्सिटी से नहीं निकलते
  • कई मीडिया रिपोर्ट्स में JNU में महिषासुर दिवस जैसे विवादित कार्यक्रम मनाए जाने का भी जिक्र होता है.
  • जेएनयू में कई बार यौन शोषण के मामले नजर आते हैं तो फिर पूरे देश के मीडिया की इस पर नजर होती है

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