गजब फैक्ट्स: सांप्रदायिक सदभावना के प्रतीक माने जाने वाले ‘बाबा रामदेव’ के ‘रूणिचा धाम’ के बारे में खास Facts

राजस्थान में जैसलमेर से क़रीब 120 किलोमीटर दूर रामदेवरा में लोक देवता बाबा रामदेव की समाधि स्थित है। मान्यता है की यहां उन्होंने जीवित समाधि ली थी। यह स्थल रूणिचा धाम के नाम से प्रसिद्ध है। रामदेवरा जी की समाधि के निकट ही बीकानेर के महाराजा गंगासिंह द्वारा 1931 में बनवाया गया भव्य मंदिर स्थित हैं। सांप्रदायिक सदभाव के प्रतीक माने जाने वाले इस लोक देवता की समाधि के दर्शन के लिए विभिन्न धर्मों को मानने वाले भक्तों का यहां साल भर तांता लगा रहता है।

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प्रतिवर्ष एक विशाल मेले का आयोजन

भादों सुदी दो से भादों सुदी ग्यारह तक यहाँ प्रतिवर्ष एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता हैं, जिसमें रामासा पीर के लाखों भक्त पहुँचते है। लोककथाओं के अनुसार बाबा के पिता अजमाल और माता मीनल ने द्वारिका के मंदिर में प्रार्थना कर प्रभु से उन जैसी संतान प्राप्ति की कामना की थी। इसीलिए बाबा रामदेव को कृष्ण का अवतार माना जाता है।
 

अन्य दर्शनीय स्थल

रामसरोवर बाबा रामदेव मंदिर के पीछे की तरफ है। यह तक़रीबन 150 एकड़ क्षेत्र में फेला हुआ हैं एवं 25 फिट गहरा हैं। बारिश से पूरा भरने पर यह सरोवर बहुत ही रमणीय स्थल बन जाता हैं। मान्यता हैं कि बाबा ने गूंदली जाति के बेलदारों से इस तालाब की खुदाई करवाई थी। यह तालाब पुरे रामदेवरा की जलापूर्ति का स्रोत हैं। कहते हैं जांभोजी के श्राप के कारण यह सरोवर मात्र छः(6) माह ही भरा रहता हैं। भक्तजन यंहा आकर इस सरोवर में डूबकी लगा कर अपनी काया को पवित्र करते हैं एवं इसका जल अपने साथ ले जाते हैं तथा नित्य आचमन करते हैं।
 

मंदिर में अभिषेक हेतु परचा बावडी

परचा बावडी परचा बावडी मंदिर के पास ही स्थित है। यहीं से बाबा के मंदिर में अभिषेक हेतु जलापूर्ति होती हैं। माना जाता हैं कि इस बावडी का निर्माण बाबा रामदेवजी के आदेशानुसार बाणिया बोयता ने करवाया था। लाखों श्रद्धालु परचा बावडी की सैंकड़ों सीढियां उतरकर यहाँ के दर्शन करने पहुँचते हैं। मान्यतानुसार अंधों को आँखें, कोढ़ी को काया देने वाला यह जल तीन पवित्र नदियों गंगा,यमुना और सरस्वती का मिश्रण हैं।
 

पाताल तोड़ कर पानी निकाला

रूणीचा कुआरूणीचा कुआ रामदेवरा गाँव से दो किमी. दूर पूर्व में स्थित हैं। यहाँ पर रामदेवजी द्वारा निर्मित एक कुआ और बाबा का एक छोटा मंदिर भी हैं। चारों और सुन्दर वृक्ष और नवीन पौधों के वातावरण में स्थित यह स्थल प्रातः भ्रमण हेतु भी यात्रियों को रास आता हैं।
मान्यता के अनुसार रानी नेतलदे को प्यास लगने पर बाबा रामदेव जी ने अपने भाले की नोक से इसी जगह पर पाताल तोड़ कर पानी निकाला था, तभी से यह स्थल “राणीसा का कुआ” के रूप में जाना जाता गया, लेकिन काफी सदियों से अपभ्रंश होते होते यह “रूणीचा कुआ” में परिवर्तित हो गया। इस दर्शनीय स्थल तक पहुँचने के लिए पक्की सड़क मार्ग की सुविधा उपलब्ध हैं एवं रात्रि विश्राम हेतु विश्रामगृह भी बना हुआ है। मेले के दिनों में यहाँ बाबा के भक्तजन रात्रि में जम्मे का आयोजन भी करते है |
 

डाली बाई की जाल

डाली बाई कि जाल अर्थात वह पेड़ जिसके नीचे रामदेव जी को डाली बाई मिली थी। यह स्थल मंदिर से 3 किलोमीटर दूर NH15 पर स्थित हैं। कहते हैं कि रामदेवजी जब छोटे थे तब उन्हें उस पेड़ के नीचे एक नवजात शिशु मिला था। बाबा ने उसको डाली बाई नाम देते हुए अपनी मुहबोली बहिन बना दिया। डाली ने अपना संपूर्ण जीवन दलितों का उद्धार करने एवं बाबा कि भक्ति को समर्पित कर दिया। इसी कारण ही उन्हे रामदेव जी से पहले समाधी ग्रहण करने का श्रेय प्राप्त हुआ |
 

मक्का से आये पांच पीरो की कहानी

पंच पीपली वही स्थान है जहां पर बाबा ने मक्का से आये पांच पीरो को उन्ही के कटोरो, जो कि वे मक्का मे ही भूल गये थे, में भोजन करवाया था.उन्ही पांच पीरो के कारण वहा पांच पीपल के पेड उग आये थे, और बाबा को “पीरो के पीर रामसापीर” की उपाधि भी प्रदान की थी। यह स्थल मंदिर से 12 की.मी. दूर एकां गाँव में स्थित है। यहां पर बाबा रामदेव का एक छोटा सा मंदिर एवं सरोवर है।

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